मंगलवार, 23 जुलाई 2013

कि सभी घूमते पहिये करते हैं मौत का प्रतिवाद!


अनुवाद करना बेहद थका देने वाला काम है… एक दूसरी ही दुनिया से मानों भाव को अपनी भाषा में उतार ले आने की अप्रतिम कोशिश… और इस प्रयास में कितना कुछ टूटता रचता सा अपने भीतर ही. कविताओं में कितनी ही सूक्ष्म बातें कह जाता है कवि…  उसकी चेतना जाने किस धरातल पर जाकर क्या क्या अनुभूतियों के चित्र खींच आती है… उन सभी बातों को अपने धरातल पर जीकर शब्द देना बड़ा दुष्कर कार्य है.
पर ये कविता ही है, जो इस तरह उग आती है भीतर कि हर स्थूल सूक्ष्म दीवार को लांघ एक से दूसरी भाषा में रच-बस जाने के अपने हुनर को बार बार सिद्ध करती सी लगती है. सो, गुज़रना हो रहा है स्वीडिश कविताओं से और उनका अनुवाद करते हुए जी रहे हैं कितने ही एहसास अपनी भाषा के धरातल पर अपने आसमान के नीचे. कभी मन व्यथित हो जाता है कवि की अनुभूतियों को जीकर… तो कभी मन हो जाता है निराश जब नहीं मिलते उपयुक्त शब्द किसी भाव को अपनी भाषा में टटोल सकने के लिये… फिर कुछ देर चलता है बंद आँखों से देखना कुछ एक अनगढ़े शब्द और फिर वहीँ से प्रकट हो आते हल को… और बहुत बार एक अनूठी ख़ुशी से आह्लादित होता है मन किसी सार्वभौम सत्य के उद्घाटन पर… कोई जी गयी सच्चाई, अपना ही कोई विश्वास जब दिख जाता है किसी कविता में… फिर सारी थकान चली जाती है, एक अकथ संतुष्टि का भाव ढँक लेता है पूरे अस्तित्व को. 
कभी लगता है कविता वो विधा है जो हो ही नहीं सकती अनूदित, एक भाषा से दूसरे तक की यात्रा में उसकी आत्मा कहीं छूट जाती है पीछे ही. फिर लगता है कविता ही वो एकमात्र विधा है जो सबसे अधिक करीने से हो सकती है अनूदित क्यूंकि कविता में  भावों की सघनता को जी लेने पर जब वह किसी और रूप में होती है प्रस्फुटित तो भी उसकी आत्मा वही रहती है, बदलता है तो बस भाषारूपी शरीर ही. बिना भावों की सघनता के संभव नहीं है कविता और उस सघनता तक पहुँचने पर सृजन स्वयं प्रवाहित हो जाता है… अनूदित होने को सहर्ष तैयार कविता स्वयं हाथ पकड़ कर मदद करती है और मन बस साथ में बहता चला जाता है.  आजकल यही सब कुछ जीने में खुद को उलझाये हुए हैं हम...
आज लिखते पढ़ते हुए ट्रांसट्रोमेर की एक कविता "चार मनोदशाएँ" का अनुवाद कर रहे थे… कविता चौथी मनोदशा का वर्णन करते हुए कुछ यूँ विराम लेती है: 

रास्ता कभी ख़त्म नहीं होता. क्षितिज आगे की ओर दौड़ लगाता है.
पंछी पेड़ पर संघर्षशील रहते हैं. धूल पहियों के चारों ओर चक्कर लगाती है.
कि सभी घूमते पहिये करते हैं मौत का प्रतिवाद! 

स्वीडिश भाषा से हिंदी में उतरते ही मेरे लिए यह भाव एकदम स्पष्ट और स्वयं को सिद्ध करने हेतु प्रतिबद्ध सा प्रतीत होने लगा… मन को ढेर सारी सांत्वना देती हुई इन पंक्तियों को लिखने के बाद एकदम से चुप हो जाने का मन किया, कुछ बिलकुल अनमोल सा नज़र आने पर कुछ एक पल का विराम ले उस भाव को जी लेने की चाह ने किताब बंद करवा दी… अगली कविता की ओर बढ़ने नहीं दिया. इसी विराम में नीले अम्बर तले लिख रहे हैं हम कि खुद से बात करना एक चुप्पी के बाद ज़रूरी सा लगने लगा. 
*****
मौत, कब्रगाह एवं इन अलौकिक रहस्यों पर कितनी ही बेहतरीन स्वीडिश कविताओं से अबतक गुज़र चुके हैं हम, कुछ का अनुवाद भी किया है… इंसान की उहापोह को रेखांकित करती, नीरव शांति का संगीत रचती जीवन और मृत्यु के एकाकार हो जाने की कवितायेँशाश्वत सत्य को आवाज़ देती कवितायेँ सार्वभौम कवितायेँ! 
विस्मित हैं हम… कितनी सरलता से  इन्ग्रिद काल्लेनबेक अपनी कविता में कह जाते हैं:  

मौत मात्र एक छोटा सा शब्द है
जिसका किया जा रहा है परिक्षण.

सच! कविता हो सकती है बहुत बड़ा संबल… हो सकती है वो जटिल सत्यों का सरल अन्वेषण. कोई जीए उन्हें, तो जाने!  
*****
अभी कुछ एक दिन पहले ही यहाँ की एक कब्रगाह में जाना हुआ था… ६४ एकड़ में फैला विशाल क्षेत्र… स्मृतियों का विस्तृत कुञ्ज… हरियाली से खिला हुआ…, उस नीरवता को लिख जाने की चाह है कि वह शाम उतर गयी है भीतर तक. 
लिखेंगे फिर कभी, अभी बस उस कब्रगाह की एक तस्वीर संलग्न… इस विराम में लिखे गए टुकड़े के साथ!
*****
और अंत में, ऐसी ही किसी कब्रगाह के बारे में निल्स फर्लिन की कविता से कुछ पंक्तियाँ:

मृत सो रहे हैं, देख नहीं रहे हैं कुछ भी 
और न ही उन्हें कुछ अब जीवन की ओर फिर से करता है आकर्षित. 
उनके लिए ये क्षेत्र है एक आरामगाह और जीवितों के लिए 
एक कब्रगाह.
*****
चिरनिद्रा में लीन आत्माओं को जीवन का मौन प्रणाम… भावभीनी श्रद्धांजलि!
इससे इतर और भला क्या अर्पित करे विकल मन…!

3 टिप्‍पणियां:

  1. भाव, संस्कृति और इतिहास, सबकुछ ही तो सम्हालना पड़ता है अनुवाद में।

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  2. कविता वो विधा है जो हो ही नहीं सकती अनूदित, एक भाषा से दूसरे तक की यात्रा में उसकी आत्मा कहीं छूट जाती है पीछे ही. फिर लगता है कविता ही वो एकमात्र विधा है जो सबसे अधिक करीने से हो सकती है अनूदित क्यूंकि कविता में भावों की सघनता को जी लेने पर जब वह किसी और रूप में होती है प्रस्फुटित तो भी उसकी आत्मा वही रहती है, बदलता है तो बस भाषारूपी शरीर ही...true.it is the way we feel and what we let the people feel

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  3. घूमते पहिये ही जिंदगी है वे ही कर सदेंगे मौत का प्रतिवाद । वे ही हैं जीवन का प्रतीक ।

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