गुरुवार, 5 सितंबर 2013

कुछ यहाँ वहाँ के टुकड़े!

मिन्नतें करने से नहीं आती बारिशें... और न ही चिट्ठियां, उन्हें आना होगा तो बेधड़क आएँगी, खूब आएँगी... मन प्राण खुशियों से भिंगाने, नहीं आना होगा तो नहीं आएँगी, भले कितनी ही मिन्नतें कर ली जाएँ... चिट्ठियां तभी न आ सकती है जब कोई लिखे उधर से और पता टाँके हमारे नाम का... बारिशें तभी न बरस सकती हैं जब कोई हो वहाँ ऊपर बादलों की बोरियों की गाँठ खोलने वाला... ऐसा कोई होगा नहीं, या होगा भी पर उसके पास न हो फुर्सत और न ही फुर्सत निकालने की कोई तमन्ना तो कैसे होंगी बारिशें, कैसे पहुंचेंगी चिट्ठियां...
ये बदमाश मन ये छोटी सी बात क्यूँ नहीं समझता आखिर और बार बार उलझता है ऐसी पहेली से जो सुलझने को तैयार ही नहीं...!
हो तो यह भी सकता है कि चिट्ठियां आ सकें इस लायक हो ही नहीं हम... बारिशें भी खूब जानती हैं उन्हें कहाँ बरसना है, उनको संयंत्रित नहीं कर सकते हम...! अपने आप से ही नाराज़ होकर खूब सारी बूंदें आँखों से बरस जाएँ ये ही हो शायद अपने हिस्से की बारिश....
और चिट्ठी... उसकी तो आस ही व्यर्थ है...!
6.7.12
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कभी हुआ है ऐसा कि आवाजें सुनने को तरस गए हों? एक अजीब सी नीरवता हो जहां अपने आप तक पहुँच पाना भी मुश्किल सा लग रहा हो?
होता है अक्सर ऐसा… आवाजें सुनने को तरसे हुए, किसी अज़ीज आवाज़ तक पहुंचे भी हों पर संवाद की सम्भावना शून्य लगी हो और रुंधे हुए गले ने किसी हेल्लो का ज़वाब दिए बगैर काट दिए हों फ़ोन. होता है ऐसा, कई बार हुआ है. स्कूल के बाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के किसी हॉस्टल में होते थे तब लगातार होता था… (घर से दूर रहना असह्य हुआ करता था और हमसे लौट जाने के कितने ही उपक्रम करवाता था… पर रहना तो पड़ा ही और पूरे सात वर्ष रहना हुआ, खैर ये अलग कहानी है.…. ) अब भी होता है रुंधे गले द्वारा यूँ ही संवाद करने की असमर्थता के कारण फोन डिसकनेक्ट करना… यहाँ वहाँ यदा कदा.
अपनी आवाज़ तक पहुंचना भी कभी कभी कितना नामुमकिन सा लगता है न!
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पहला... ये शब्द ही ऐसा है, कि इसके बाद जो भी शब्द लगे वो इतना खूबसूरत हो जाता है कि फिर आजीवन उसके मोह से नहीं निकला जा सकता!
ज़िन्दगी भी वैसी ही खूबसूरत शय है... जी जानी चाहिए, हर हाल में!
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अलविदा कहते हुए जो आँखें भर आयीं तो अब तक नम हैं, दूर हो कर भी लोग साथ हो सकते हैं.… यही एक बात है जो बहुत बड़ी सांत्वना है जीवन के लिए.… 
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जीवन ने जो भी सीखाया, सब सीख कहाँ पाए हम, अब भी राहों में चलना कहाँ आता है हमें! जीवन की पाठशाला के अच्छे विद्यार्थी होने का मर्म ही समझ रहे हैं और दर्द रुपी शिक्षक हर पल हमारे सिरहाने बैठा हमें राह दिखा रहा है, कितना सीख समझ पाते हैं यह तो वक़्त पर छोड़ देना ही बेहतर है.
सभी गुरुओं को नमन!
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तस्वीर: बाल्टिक सागर में डूबती एक शाम… 
सब टुकड़े हैं, कोई किसी से जुड़ा नहीं है वैसे ही यह तस्वीर भी असम्बद्ध है टुकड़ों से फिर भी मेरा मन एक सम्बद्धता देख रहा है सभी टुकड़ों में तो तस्वीर भी साथ टांक रहे हैं.… हो सकती है न ये डूबती शाम भी विशाल सागर में निपट अकेली और उदास…!
और हाँ इस बेवजह के यहाँ वहाँ में, सबसे महत्वपूर्ण hello की कथा कहानी, जिसका लिंक हमने ऊपर भी दिया है… कितनी बार कहते हैं न हम यह शब्द पर कहाँ जानते हैं इसके बारे में इतना कुछ.…!

9 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय......यह सच है जीवन ने जो भी सीखाया, सब सीख कहाँ पाए हम, अब भी राहों में चलना कहाँ आता है हमें!……बहुत सही कहा आपने । बहुत बढियां प्रस्तुती । शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनायें |

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  2. सुंदर प्रस्तुति..कई सारे छोटे-छोटे टुकड़े मिलके गहरी बातें बयाँ कर रहे हैं।।।

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  3. बहुत सुंदर प्रस्तुती ....
    शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनायें ....

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  4. दरअसल ये एक बेहद अनहद पोस्ट है.. जीवन में कुछ शब्द संजीवनी का काम करते हैं ..जैसे आपने लिखा
    १. ज़िन्दगी भी वैसी ही खूबसूरत शय है... जी जानी चाहिए, हर हाल में
    २. अपनी आवाज़ तक पहुंचना भी कभी कभी कितना नामुमकिन सा लगता है न!
    आपसे आगे ऐसे ही पोस्ट की उम्मीद रहेगी ....... शुक्रिया

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. जी आप अभी तक हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल मे शामिल नही हुए क्या.... कृपया पधारें, हम आपका सह्य दिल से स्वागत करता है।

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  6. दूर हो कर भी लोग साथ हो सकते हैं.… यही एक बात है जो बहुत बड़ी सांत्वना है जीवन के लिए.…
    खूबसूरत शब्दों का एहसास

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  7. अनुपमा जी आपकी कितनी ही रचनाएँ पढ़ीं ...गद्य भी पद्य का मजा दे रहे हैं ...प्रभाव शाली ...

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