सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

यात्रा अनवरत और कलम का प्यारा साथ...!


कवितायेँ उदास होती जा रही हैं... कहीं छुप जाना चाहिए हमको... कलम तोड़ देनी चाहिए... नहीं लिखना चाहिए लेकिन फिर ये कलम भी कम कहाँ है तर्क पर उतर आती है... कहती है 'मुझे भी तोड़ दोगी तो तुम्हें कौन संभालेगा हर क्षण' और फिर एक चुप्पी; जो कहना था वह तो कह गयी वो, क्या जवाब दें? निःशब्द हैं और कलम मुस्कुरा रही है क्यूंकि वो जानती है कि तमाम तर्क वितर्क के बाद उसी की शरण में जायेंगे... टिकट ले कर यूँ ही यात्रा पर निकल जायेंगे... बस से या मेट्रो से और वहाँ भी कोई कागज़ निकाल कर कलम दौड़ाने लगेंगे... इसके सिवा उपाय भी क्या है...
हरदम बारिश थोड़े ही न होती है कि उसमें रोते हुए चले आप और कोई समझ भी न पाए, हमेशा बर्फ़ भी तो नहीं गिरती कि उसके ही कुछ कण चेहरे को यूँ ढ़क ले कि आंसू निश्चिन्तता से बह सके... इसीलिए तो होती है कलम... यूँ आंसू लिख जाती है कि एक सुकून मिलता है इस बात का कि दर्द व्यर्थ नहीं गया... लिखे हुए शब्द ऐसी ही व्यथा से जूझ रहे किसी व्यक्ति का सहारा बन जायेंगे... अगर उसकी नज़र से यूँ ही गुज़र गए तो! होता है न ऐसा कि कई बार कितना कुछ पढ़ते हुए अनायास लगता है जैसे मेरी ही बात हो रही हो... मेरा ही दर्द लिखा गया हो... फिर जो सांत्वना मिलती है यह वही समझ सकता है जो कभी न कभी ऐसे अनुभव से गुज़रा हो...!
दर्द ही तो है वो तत्व जो जोड़ता है सभी को... सुख में तो हमने वो ताकत नहीं देखी अबतक. फिर कलम समझाती है हमें... 'अरे तू इतना न सोचा कर... जानती है, ये लिखा हुआ तेरे कई बिछड़े हुए मित्रों को बड़ा सुकून देता है...!'
सच कहती है कलम, अभी कल ही तो वह कह रहा था कि मेरी कविताओं को गुनगुनाते हुए कई पड़ाव पार कर लिए उसने... वर्षों बाद मिलने वाले स्कूल के मित्रों को भी अब तक याद है मेरी कवितायेँ... कलम टूट जाती थी तो कलम ही भेंट करने वाले कितने मित्र याद हो आते हैं...
हाँ लेखनी! हमें तुम्हारी बात मान लेनी चाहिए. चलो हम दोनों अब थोड़ा हंस लें, इससे पहले कि कोई परेशानी फिर दस्तक दे दरवाज़े पर:)

2 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन का सफर और लेखनी से कागज़ के पन्नों पे उतरती दास्ताँ ... दोनों यूं ही चलती रहें ...

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